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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 141

हृदय तू मोरि सिखावनि मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hṛidaya! tū mori sikhāvani māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हृदय तू मोरि सिखावनि मान।

2तू चाहत निज परम सनेही, सुंदर श्याम सुजान।

3सो निष्ठुर सपनेहुँ नहिं सोचत, हृदयहीन जनु कान्ह।

4बिनु दरशन तू चहत मीच पुनि, कैसेहुँ निकसैं प्रान।

5सोऊ करत न प्राणनाथ तू, बड़ मूरख अज्ञान।

6बूझि गई मैं गूढ़ पहेली, याचन उलटो दान।

7अब “कृपालु” मन चहहु विरह तब, मिलिहैं पिय जिय जान॥

हिन्दी भावार्थ

हे मन! तू मेरी शिक्षा को ग्रहण कर। तू अपने परम प्रियतम श्री श्यामसुन्दर का मधुर-मिलन चाहता है, किन्तु वे ऐसे निष्ठुर हैं कि स्वप्न में भी तेरे दुःख पर नहीं विचार करते। फिर मधुर-मिलन के अभाव में तू चाहता है कि किसी प्रकार मेरे प्राण ही निकल जायें, किन्तु प्राणनाथ ऐसा भी नहीं होने देते। तू ऐसा मूर्ख है कि उनकी चाल बिल्कुल ही नहीं समझ पाता। रे मन! मैं उनका सिद्धांत तेरे प्रति किये हुए व्यवहारों के द्वारा भली-भाँति समझ चुका। तू जो कुछ भी माँगता है, वे उसका उल्टा ही दान करते हैं अर्थात् तेरे मिलन माँगने पर वियोग दिया, मृत्यु माँगने पर जीवन दिया। अतएव 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन! अब तू प्यारे श्यामसुन्दर का वियोग ही माँग, तभी उनका मधुर-मिलन प्राप्त होगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 170-171