सिद्धान्त-माधुरी · पद 140
हृदय तू कुलिश कठोर लखात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hṛidaya! tū kulisha kaṭhora lakhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हृदय तू कुलिश कठोर लखात।
2जो तू होतो लौह विरह दव, कब को ही जरि जात।
3भाजु प्राण! अब प्राणनाथ ढिग, विरह करन चह घात।
4उर-गृह लागि आगि तू सोवत, जोवत मौत जनात।
5हाय! गोहारि लागु अब कोऊ, विरह जरावत गात।
6लखि “कृपालु” दृग धाय लाय जल, करन लगे बरसात॥
हिन्दी भावार्थ
रे मन! तू वज्र से भी अधिक कठोर प्रतीत होता है क्योंकि यदि तू लोहा भी होता तो कब का ही विरहाग्नि में जलकर भस्म हो जाता। हे प्राण! तू अब शीघ्र ही प्राणनाथ श्यामसुन्दर के पास भाग जा। विरहाग्नि विश्वासघात करना चाहती है। अरे प्राण! हृदय में विरह की आग जल रही है फिर भी तू सो रहा है। ऐसा जान पड़ता है कि तू अपनी मृत्यु चाहता है। हाय! हाय! कोई मेरी पुकार सुनकर मुझे इस विरहाग्नि से बचा लो। कृपालु' कहते हैं कि-इस प्रकार मेरे करुण क्रन्दन को सुनकर दयावश तत्क्षण ही दोनों नेत्रों ने आँसुओं के जल की वर्षा आरम्भ कर दी, जिससे विरह की अग्नि कुछ धीमी पड़ गई।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 170