सिद्धान्त-माधुरी · पद 139
हरि बिनु बिगरी नाहिं बने।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: harī binu bigarī nāhiṁ bane
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हरि बिनु बिगरी नाहिं बने।
2कर्म ज्ञान अरु भक्ति -साधना, वेदन यदपि भने।
3तदपि न छुटत मोह माया मन, किये यतन अपने।
4सुत वित पति तिय महँ नित देखत, साँचे सुख सपने।
5बुधि समुझाय थकी बहु विधि मन, पै मन नाहिं मने।
6कहे “कृपालु” हरि अनुकंपा बिनु, मन हरि रस न सने॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर की प्राप्ति के बिना अनादि काल का दुःख नहीं समाप्त हो सकता। यद्यपि वेदों ने कर्म, ज्ञान एवं भक्ति की साधना का निरूपण किया है, तथापि अपने प्रयत्न करने मात्र से माया का अत्यन्ताभाव नहीं हो सकता! धन पुत्र, स्त्री, पति में सच्चा सुख मानने का अभ्यास पड़ गया है। बुद्धि ने मन को अनेक प्रकार से समझाया किन्तु फिर भी मन नहीं मानता। 'कृपालु' कहते हैं-हे श्यामसुन्दर। तुम्हारी म त के बिना मन तुम्हारे चरण-कमलों का रसिक नहीं बन सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 169