दैन्य-माधुरी · पद 15
अहो हरि! हरो विषम भव भीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! haro vishama bhava bhīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! हरो विषम भव भीर।
2देहु भीख निष्काम प्रेम की, आयो द्वार अधीर।
3लख चौरासी योनि भ्रम्यों मैं, धरि धरि अमित शरीर।
4मिटी न प्यास पियत निशिवासर, मृग मरीचिका नीर।
5काम क्रोध मद बहुत सतायो, सहि न जात अब पीर।
6विरद विचारि “कृपालु” आपुनो, जनि बनिये बेपीर॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! आपके द्वार पर यह दीन-भिक्षुक कातर होकर निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है। कृपा करके इसकी इच्छा पूर्ण कीजिये एवं मायिक विकारों से बचाइये। मैं स्थावर-जंगम चौरासी लाख योनियों में बार-बार अनादिकाल से अनंतानंत देह धारण करके अत्यधिक भटक चुका हूँ। निरन्तर मृगजल के समान सांसारिक विषयों का रसपान करते हुए भी, आपको मधुर मिलन-रूपी मेरी आध्यात्मिक प्यास नहीं मिट सको। आपको माया के बड़े-बड़े सेनापतियों काम क्रोध, अहंकार आदिकों ने अत्यन्त ही दुःखी कर दिया है। अब यह दुःख सहा नहीं जाता अतएव 'अकारण करुण पतितपावन, दीनबन्धु'आदि अपनी प्रतिज्ञाओं पर विचार करते हुए निष्ठुर न बनिये वरन् उपरोक्त निष्काम-प्रेम प्रदान करके मुझ अकिंचन को कृतार्थ कीजिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 185-186