सिद्धान्त-माधुरी · पद 34
को कह राधे सम गिरिधारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ko kaha rādhe sama giridhārī ?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1को कह राधे सम गिरिधारी।
2कित वृषभानुभूप की बेटी? कित गोकुल गोकुल वनचारी।
3कनक-मुकुट मणिमय शोभित कित? कित मयूर पंखन सिरधारी।
4कित छवि मोतियन लर उर राजित? कित गल गुंजन की माला री।
5कित षोड़श श्रृंगार कलित छवि? कित कर लकुटि कामरी कारी।
6कित भोरी अति सरल किशोरी? कित लंपट बेपीर मुरारी।
7कित “कृपालु” आराध्य स्वामिनी? कित पद अवराधक बनवारी॥
हिन्दी भावार्थ
कौन कहता है कि किशोरी जी की समता श्रीकृष्ण कर सकते हैं अर्थात् किशोरी जी की समता श्रीकृष्ण कभी नहीं कर सकते। कहाँ तो राजा वुषभानु की राजकुमारी राधिका एवं कहाँ यशोदा के गोद लिये हुए गोकुल के गायों के चरवाहे श्रीकृष्ण। कहाँ तो किशोरी जी के सिंर पर मणियों से जटित स्वर्ण का सुन्दर मुकुट एवं कहाँ मोर के पंखों का मुकुट। कहाँ तो गले में लटकती हुई मणियों और मोतियों की माला, एवं कहाँ गले में घुँघची की माला। कहाँ तो सोलहों- शृंगार से युक्त किशोरी जी एवं कहाँ हाथ में लठिया तथा कंधे पर काली कमली डाले हुए श्रीकृष्ण। कहाँ तो अत्यन्त भोली तथा सरल किशोरी जी एवं कहाँ गोपी-प्रेमरस में दीवाने निष्ठुर श्रीकृष्ण 'कृपालु' कहते हैं कि कहाँ तो उपासना करने योग्य किशोरी जी, एवं कहाँ उनके चरणों के उपासक श्रीकृष्ण।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 87