सिद्धान्त-माधुरी · पद 33
कहत हम खरी खरी कछु बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahata hama kharī-kharī kachhu bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहत हम खरी खरी कछु बात।
2बुरो न मानिय साधक-जन कछु, सोचिय समुझिय तात।
3कंठी-तिलक धारि वैष्णव बनि, गणिकनि राखत नात।
4सबहिं योगवाशिष्ठ सुनावत, ममता-मद बलकात।
5करत अनंत शिष्य पै इंद्रिन, शिष्य रहत दिन रात।
6रसिकनि लखि जरि जात मंदमति, विषइन सों बतरात।
7महारास-रस भेद बतावत, जहँ विधि-बुधि बौरात।
8निज कहँ कहत “कृपालु” दीन पै, रोम रोम मदमात॥
हिन्दी भावार्थ
साधना अवस्था में कंचन, कामिनी एवं कीर्ति के चक्कर में पड़ जाने वाले, लोकरंजन का ही लक्ष्य-मात्र रखने वाले साधकों! हमारी निम्नलिखित स्पष्ट हित को भावना से कही हुई बातों का बुरा न मानना। क्योंकि हम कुछ स्पष्ट बातें कहने जा रहे हैं। इसको निष्पक्ष होकर एकान्त में सोचने समझने का प्रयत्न करना। ऐसे दंभी, कंठी पहिनकर एवं तिलक लगाकर वैष्णव बनने. का दावा रखते हुए भी, वेश्याओं से सम्बन्ध रखते हैं। चार-अक्षर पढ़ लेने के कारण सबको योगवशिष्ठ नामक ग्रंथ जिसमें ब्रह्म का ज्ञान लिखा है, जिसका अधिकारी साधन-चतुष्टय-सम्पन्न ही होता है, सुनाया करते हैं और स्वयं सांसारिक जीवों की आसक्ति में बंधे हैं। वे दंभी यों तो कान फूँक-फूँककर अनन्तानन्त चेले बनाते हैं, पर स्वयं अपनी ही इन्द्रियों के निरन्तर चेले बने रहते हैं, वास्तविक महापुरुषों को देखकर वे दंभी लोग मूर्खतावश जलने लगते हैं उनके पास तक जाना पसन्द नहीं करते, दूर से ही निंदा किया करते हैं किंतु स्वयं विषयीजनों से बातें एवं उनकी प्रशंसाएँ किया करते हैं। जिस संसार का प्रतिक्षण अनुभव हो रहा है फिर भी उससे वैराग्य नहीं हो पाता। किन्तु ऐसी अवस्था वाले भी वे दम्भी, ब्रह्मा आदि की बुद्धि से भी अतीत, अपने ही कोटि वाले नारकीय जीवों के समक्ष महारास का रहस्य समझाते हैं। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि मैं भी स्वयं अपने आपको सबके सामने दीन कहा करता हूँ किन्तु मेरे रोम-रोम में अभिमान भरा पड़ा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 85-87