सिद्धान्त-माधुरी · पद 32
करो जनि मन! मनमानी काम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karo jani mana! manamānī kāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करो जनि मन! मनमानी काम।
2विषयन हाथ अनादि-काल ते, बिके रहे बिनु दाम।
3आयो लखि, दुख लख-चौरासी, पायो नहिं विश्राम।
4अंधहुँ लगे ठेह बारेक, पग, धरत सोचि तेहि ठाम।
5पै तू अंध जात हठि तेहि मग, अधाधुंध अविराम।
6जो “कृपालु” बीती बीती अब, सुमिरिय श्यामा-श्याम॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! मूर्खतावश मनमाना कार्य मत कर। देख तू अनादि काल से अकारण ही सांसारिक विषय वासनाओं का दास बना रहा तथा चौरासी लाख योनियों के अनन्त दुःखों का भी अनुभव करके देख लिया कि कहीं भी सुख और शांति नहीं है। अरे मन! अन्धे को भी जब एक बार ठोकर लग जाती है तब वह उस जगह बड़ी सावधानी के साथ पैर रखता है, पर तू ऐसा मूर्ख अन्धा है कि हठवश निरन्तर बड़ी तेजी के साथ उसी मार्ग में चलता है। इस प्रकार अनन्त बार ठोकरें खाकर भी सांसारिक विषयों से विरक्त नहीं होता। 'कृपालु' कहते हैं कि जो कुछ अब तक हुआ उसे भूल जा, एवं अब भी श्यामा श्याम की शरण होकर उनका निरन्तर स्मरण कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 85