सिद्धान्त-माधुरी · पद 31
करहु बुधजन मन माहिं विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karahu budhajana mana māhiṁ vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करहु बुधजन मन माहिं विचार।
2निराकार है ब्रह्म कहत कोउ, कोउ कह है साकार।
3हम कह निराकार साकारहिं, भेद कहा उर धार।
4निराकार तुमहूँ तो तुम्हरो, तनु साकार निहार।
5पुनि कत सो तनु धारि सकत नहिं, जो समरथ भरतार।
6पै “कृपालु” तव तनु प्राकृत अरु, तनु चिन्मय करतार॥
हिन्दी भावार्थ
बुद्धिमान लोग मेरी बात पर विचार करें। ब्रह्म को कोई निराकार एवं कोई साकार बताता है। मेरी दृष्टि में तो इन दोनों में कोई भेद ही नहीं है। क्योंकि जब असमर्थ जीवात्मा भी साकार शरीर धारण किये हुए दिखाई पड़ रही है। तब फिर समर्थ भगवान् के लिए शरीर धारण करना क्या असंभव है। 'कृपालु' कहते हैं कि जीवात्मा एवं परमात्मा के शरीर धारण करने में इतना अन्तर अवश्य है कि जीवात्मा मायाधीन होकर प्राकृत शरीर धारण करता है किन्तु परमात्मा मायाधीश होने के कारण दिव्य चिन्मय देह धारण करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 84-85