सिद्धान्त-माधुरी · पद 30
कबै हरि हौं पैहौं ब्रजवास।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kabai hari! hauṁ paihauṁ brajavāsa?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कबै हरि हौं पैहौं ब्रजवास।
2नरक, स्वर्ग, अपवर्ग न माँगत, नहिं बैकुण्ठ-विलास।
3माँगत भीख एक मन-मोहन, पुरवहु मम अभिलास।
4गाऊँ गुन गोविंद रैन-दिन, जाऊँ नहिं जग पास।
5ह्वै मदमत्त निकुंजनि-पुंजनि, लखूँ मंजु रस-रास।
6हौं “कृपालु” अस दास कहाऊँ, बनि दासन को दास॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मैं कब तुम्हारे दिव्य धाम में निवास करूँगा। मैं नरक, सात स्वर्ग, चारों मोक्ष या बैकुण्ठ का ऐश्वर्य कुछ नहीं माँगता। मैं केवल ब्रजवास की ही भिक्षा माँगता हूँ। कृपा करके इस इच्छा को पूर्ण कर दो। मैं ब्रजवास करता हुआ निरन्तर तुम्हारे ही गुणों को गाऊँ एवं सांसारिक विषयों के पास भी न जाऊँ। प्रेम-रस-विभोर होकर सुन्दर लताकुंजों में तुम्हारी रासलीला देखूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम्हारे दासों का दास बनकर तुम्हारा दास कहलाऊँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 83-84