सिद्धान्त-माधुरी · पद 29
ओ मन! मूरख अब चेत रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: o mana! mūrakha aba cheta re!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ओ मन! मूरख अब चेत रे।
2तोहिं लखि परत न, रहत विषयरत, करत न हरि सों हेत रे।
3नित्य बनावत महल कल्पनहिं, जासु नींव लखु रेत रे।
4लै जैहैं विषयन हमहूँ कहँ, यमपुर तोहिं समेत रे।
5तब पछिताने का पैहौ जब, खग चुगि जैहैं खेत रे।
6याते करहु “कृपालु” भजन उन, जो हैं कृपा निकेत रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मूर्ख मन! तू अब भी होश में आ जा। तुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ता, विषयों में ही अनुरक्त रहता है, श्री श्यामसुन्दर से प्रेम नहीं करता। अरे मन! देख तो, जिन कल्पनाओं के तू नित्य महल बनाया करता है उन महलों की नींव बालू की है। ये इन्द्रियों के विषय मुझ आत्मा सहित तुमको यमपुरी ले जायेंगे। जब चिड़ियाँ खेत चुग जायँगी तब पछताने से क्या होगा। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम्हारा उद्देश्य तभी पूरा होगा जब श्यामसुन्दर के चरणों में अपने को लगाओगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 83