सिद्धान्त-माधुरी · पद 28
आजु मन! देखहुँ शक्ति तिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju mana! dekhahuṁ shakti tihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु मन! देखहुँ शक्ति तिहार।
2ठग्यो मोहिं युग-युग ते याते, हो पूरे ठगहार।
3मोहिं ठगि नहिं कछु धन पायो रह, टोटो येहि व्यापार।
4ढूँढ़्यौं हौं इक धनिक ठगन को, जो अति सरल उदार।
5धन बड़ प्रेम धाम बरसानो, नाम जु भानुदुलार।
6बिनु श्रम निज अभीष्ट धन पैहौ, जैहौ जो इक बार।
7चतुर “कृपालु” नारदी विद्या, जानत यदपि गँमार॥
हिन्दी भावार्थ
रे मन! आज देखता हूँ तुझमें कितनी शक्ति है। तूने मुझे करोड़ों युगों से सदा ही ठगा है, अतएव तुम ठगने में पूर्ण विशारद हो, किन्तु बार-बार मुझे ठगकर भी तुम दरिद्र ही बने रहे। तुम्हें कुछ भी सुख न प्राप्त हो सका। आज मैं तुमसे मैत्रीभाव से एक बात कहता हूँ जो तुम्हारे हित की है। मैंने तुम्हारे ठगने के लिए एक बहुत बड़े सेठ का पता लगा लिया है, जो अत्यन्त सरल एवं भोला-भाला है। जिसके पास निष्काम-प्रेम-रूपी अमूल्य धन प्राप्त होगा, जिसकी तुम खोज में हो। उस सेठ का गाँव बरसाना है एवं उसका नाम वृषभानुदुलारी है। यदि तुम एक बार भी मेरी राय मानकर वहाँ चले जाओ तो बिना परिश्रम के अपने अभीष्ट प्रेम-धन, सुख और शांति, जिसके दास हैं, पा जाओगे। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि यद्यपि हम गँवार हैं, फिर भी भिड़ाने वाली नारदी विद्या में बहुत ही चतुर हैं। तात्पर्य यह है कि जब मेरे बहकावे में आकर मन किशोरी जी के दरबार में चला जायगा तब मैं कृतार्थ हो ही जाऊँगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 82-83