# को कह राधे सम गिरिधारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0043-M03-K034
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 34
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 23–23

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>को कह राधे सम गिरिधारी।  
<a id="line-2"></a>कित वृषभानुभूप की बेटी? कित गोकुल गोकुल वनचारी।  
<a id="line-3"></a>कनक-मुकुट मणिमय शोभित कित? कित मयूर पंखन सिरधारी।  
<a id="line-4"></a>कित छवि मोतियन लर उर राजित? कित गल गुंजन की माला री।  
<a id="line-5"></a>कित षोड़श श्रृंगार कलित छवि? कित कर लकुटि कामरी कारी।  
<a id="line-6"></a>कित भोरी अति सरल किशोरी? कित लंपट बेपीर मुरारी।  
<a id="line-7"></a>कित “कृपालु” आराध्य स्वामिनी? कित पद अवराधक बनवारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

कौन कहता है कि किशोरी जी की समता श्रीकृष्ण कर सकते हैं अर्थात् किशोरी जी की समता श्रीकृष्ण कभी नहीं कर सकते। कहाँ तो राजा वुषभानु की राजकुमारी राधिका एवं कहाँ यशोदा के गोद लिये हुए गोकुल के गायों के चरवाहे श्रीकृष्ण। कहाँ तो किशोरी जी के सिंर पर मणियों से जटित स्वर्ण का सुन्दर मुकुट एवं कहाँ मोर के पंखों का मुकुट। कहाँ तो गले में लटकती हुई मणियों और मोतियों की माला, एवं कहाँ गले में घुँघची की माला। कहाँ तो सोलहों- शृंगार से युक्त किशोरी जी एवं कहाँ हाथ में लठिया तथा कंधे पर काली कमली डाले हुए श्रीकृष्ण। कहाँ तो अत्यन्त भोली तथा सरल किशोरी जी एवं कहाँ गोपी-प्रेमरस में दीवाने निष्ठुर श्रीकृष्ण 'कृपालु' कहते हैं कि कहाँ तो उपासना करने योग्य किशोरी जी, एवं कहाँ उनके चरणों के उपासक श्रीकृष्ण।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 87

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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