आरती-माधुरी · पद 1
श्रीकृष्ण जी की आरती
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āratī ārati-hārī kī, ki vṛindāvipina bihārī kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्रीकृष्ण जी की आरती
2आरती आरति-हारी की, कि वृन्दाविपिन बिहारी की।
3बँधी सिर तिरछी सी पगड़ी,
4जड़ी मणि-मुक्त न मुकुट लड़ी,
5अड़ी अड़बंग मोर-पँखड़ी,
6मुकुट की लटक, भृकुटि की मटक, लकुटि की अटक,
7चटक केशर छवि न्यारी की।
8नाक बिच भल बुलाक हलकै,
9कान-कुण्डल झलमल झलकै,
10दृगंचल चंचल रस छलकै,
11अलक की हलक, पलक की छलक, कलक की झलक,
12ललक देखन छवि प्यारी की।
13सुघर उपरैना उर राजै,
14पीतपट अटपट छवि छाजै,
15काछनी नट सी कटि भ्राजै,
16नैनगति-मैन, सैन अति पैन, बैन रति दैन,
17लैन मति ब्रज-नर-नारी की।
18पाणि मणिमय-कंकण सोहै,
19कनक-किंकिनी-धुनि मन मोहै,
20अनूपम की उपमा को है,
21नंद-आनंद, कन्द-आनंद, सच्चिदानंद,
22“कृपालु” चंद-तनु कारी की॥
हिन्दी भावार्थ
आनन्द प्रदान करने वाले वृन्दावन-बिहारी की मैं आरती करता हूँ। जिनके सिर पर तिरछी सी पगड़ी बँधी है, मुकुट में रंग-बिरंगी मणियाँ जड़ी हैं, एवं मोतियों की लड़ियाँ अटक रही हैं तथा अनोखे ढंग से मोर की पंखड़ी खोंसी हुई है। पुनः मुकुट की लटक, भौंहों की मरक, लठिया की अटक एवं केशर की चटक की छवि तो अत्यन्त ही अनोखी है। जिनकी नासिका में सुन्दर बुलाक झूल रही है, जिनके कान में झलमल करता हुआ कुण्डल झलक रहा है, जिनकी आँखों के चंचल कटाक्ष में प्रेम रस छलक रहा है, जिनकी लटें झूम रही हैं एवं पलकों से प्रेम-रस झलक रहा है। हृदय में प्रेमोत्कण्ठा उद्दीप्त हो रही है एवं इनके नेत्रों में किशोरी जी के दर्शन की लालसा प्रस्फुटित हो रही है। जिनके वक्षःस्थल पर सुन्दर पीताम्बर सुशोभित है। जिनका पीला अधोवस्त्र विलक्षण छवि लिए हुए है। जिनकी कमर में नट के समान काछनी कछी हुई है, जिनकी आँखें कामदेव को मोहित करती हैं। कटाक्ष पैने हैं। जिनकी मृदु बोलनि प्रेमदायिनी है। जो ब्रज के समस्त नर-नारियों की बुद्धि को प्रेम विभोर किये हुए हैं। जिनके हाथों में मणियों के कंकण सुशोभित हैं। जिनकी स्वर्ण की किंकिनि की धुनि बरबस मन मोह लेती है, जिनकी उपमा में अन्य कोई नहीं हो सकता है। नन्द को आनन्द देने वाले, आनन्द के भी सत्-चित्-आनंद स्वरूप, चन्द्रवंश में श्याम वर्ण के शरीर धारण करने वाले वृन्दावन-बिहारी की 'कृपालु' आरती करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 53-54