# श्रीकृष्ण जी की आरती

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0007-M02-K001
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: आरती-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 1
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 4–5

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्रीकृष्ण जी की आरती  
<a id="line-2"></a>आरती आरति-हारी की, कि वृन्दाविपिन बिहारी की।  
<a id="line-3"></a>बँधी सिर तिरछी सी पगड़ी,  
<a id="line-4"></a>जड़ी मणि-मुक्त न मुकुट लड़ी,  
<a id="line-5"></a>अड़ी अड़बंग मोर-पँखड़ी,  
<a id="line-6"></a>मुकुट की लटक, भृकुटि की मटक, लकुटि की अटक,  
<a id="line-7"></a>चटक केशर छवि न्यारी की।  
<a id="line-8"></a>नाक बिच भल बुलाक हलकै,  
<a id="line-9"></a>कान-कुण्डल झलमल झलकै,  
<a id="line-10"></a>दृगंचल चंचल रस छलकै,  
<a id="line-11"></a>अलक की हलक, पलक की छलक, कलक की झलक,  
<a id="line-12"></a>ललक देखन छवि प्यारी की।  
<a id="line-13"></a>सुघर उपरैना उर राजै,  
<a id="line-14"></a>पीतपट अटपट छवि छाजै,  
<a id="line-15"></a>काछनी नट सी कटि भ्राजै,  
<a id="line-16"></a>नैनगति-मैन, सैन अति पैन, बैन रति दैन,  
<a id="line-17"></a>लैन मति ब्रज-नर-नारी की।  
<a id="line-18"></a>पाणि मणिमय-कंकण सोहै,  
<a id="line-19"></a>कनक-किंकिनी-धुनि मन मोहै,  
<a id="line-20"></a>अनूपम की उपमा को है,  
<a id="line-21"></a>नंद-आनंद, कन्द-आनंद, सच्चिदानंद,  
<a id="line-22"></a>“कृपालु” चंद-तनु कारी की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

आनन्द प्रदान करने वाले वृन्दावन-बिहारी की मैं आरती करता हूँ। जिनके सिर पर तिरछी सी पगड़ी बँधी है, मुकुट में रंग-बिरंगी मणियाँ जड़ी हैं, एवं मोतियों की लड़ियाँ अटक रही हैं तथा अनोखे ढंग से मोर की पंखड़ी खोंसी हुई है। पुनः मुकुट की लटक, भौंहों की मरक, लठिया की अटक एवं केशर की चटक की छवि तो अत्यन्त ही अनोखी है। जिनकी नासिका में सुन्दर बुलाक झूल रही है, जिनके कान में झलमल करता हुआ कुण्डल झलक रहा है, जिनकी आँखों के चंचल कटाक्ष में प्रेम रस छलक रहा है, जिनकी लटें झूम रही हैं एवं पलकों से प्रेम-रस झलक रहा है। हृदय में प्रेमोत्कण्ठा उद्दीप्त हो रही है एवं इनके नेत्रों में किशोरी जी के दर्शन की लालसा प्रस्फुटित हो रही है। जिनके वक्षःस्थल पर सुन्दर पीताम्बर सुशोभित है। जिनका पीला अधोवस्त्र विलक्षण छवि लिए हुए है। जिनकी कमर में नट के समान काछनी कछी हुई है, जिनकी आँखें कामदेव को मोहित करती हैं। कटाक्ष पैने हैं। जिनकी मृदु बोलनि प्रेमदायिनी है। जो ब्रज के समस्त नर-नारियों की बुद्धि को प्रेम विभोर किये हुए हैं। जिनके हाथों में मणियों के कंकण सुशोभित हैं। जिनकी स्वर्ण की किंकिनि की धुनि बरबस मन मोह लेती है, जिनकी उपमा में अन्य कोई नहीं हो सकता है। नन्द को आनन्द देने वाले, आनन्द के भी सत्-चित्-आनंद स्वरूप, चन्द्रवंश में श्याम वर्ण के शरीर धारण करने वाले वृन्दावन-बिहारी की 'कृपालु' आरती करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 53-54

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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