सद्गुरु-माधुरी · पद 4
जाउँ गुरु, चरण-कमल बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jāuṁ guru, charaṇa-kamala balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जाउँ गुरु, चरण-कमल बलिहार।
2जिन चरनन की शरण गहत मन, पावत युगल-विहार।
3जिन चरनन को ध्यान धरत मन, मिटत जगत अँधियार।
4जिन चरनन अनुकंपा जग मँह, रहत न रह संसार।
5जिन चरनन-रज आँजि चराचर, दीखत नंदकुमार।
6यदपि “कृपालु” भेद नहिं हरि-गुरु, तदपि गुरुहिं आभार॥
हिन्दी भावार्थ
मैं सद्गुरु महाराज के चरण-कमलों पर बलिहार जाता हूँ। उन चरणों की शरण ग्रहण करके मन श्यामा श्याम का रास-विहार-रस पाता है एवं उन चरणों की कृपा से ही अज्ञानांधकार सदा को समाप्त हो जाता है। उन चरणों की को श्रद्धापूर्वक आँखों में लगाने से श्यामसुन्दर का दिव्य रशन प्राप्त होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि गुरु एवं हरि में यद्यपि भेद नहीं हैं तथापि गुरु द्वारा ही हरि की प्राप्ति होने के कारण गुरु के प्रति विशेष आभार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 50