सद्गुरु-माधुरी · पद 5
बलि श्री गुरुदेव कृपाल की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali shrī gurudeva kṛipāla kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बलि श्री गुरुदेव कृपाल की।
2जिनके दिव्य वचन सुनि छूटत, ग्रंथि अविद्या-जाल की।
3जिनके वरद-हस्त के सन्मुख, चल न चाल कलिकाल की।
4जिनके बनत बिगारि सकत नहिं, मायाशक्ति गुपाल की।
5जिनके युगल-चरन परसत मन, पावत रति नंदलाल की।
6लखत “कृपालु” अनुग्रह गुरु के, लीला लाड़लि लाल की॥
हिन्दी भावार्थ
कृपालु गुरुदेव पर बार-बार बलिहार जाता हूँ उनके दिव्य उपदेशों को सुनकर अविद्या की गाँठ खुल जाती है। उनकी कृपा हो जाने पर कलिकाल का प्रभाव जाता रहता है। उनके दास बन जाने पर अतिशय प्रबल मायाशक्ति बाल तक बाँका नहीं कर सकती। उनके युगल चरणों को भक्तिपूर्वव स्पर्श करने पर कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि सद्गुरु की कृपा से मैं सदा श्यामा श्याम की नयी-नयी लीलाओं का रस लेता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 51