# बलि श्री गुरुदेव कृपाल की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0005-M01-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सद्गुरु-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 2–3

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बलि श्री गुरुदेव कृपाल की।  
<a id="line-2"></a>जिनके दिव्य वचन सुनि छूटत, ग्रंथि अविद्या-जाल की।  
<a id="line-3"></a>जिनके वरद-हस्त के सन्मुख, चल न चाल कलिकाल की।  
<a id="line-4"></a>जिनके बनत बिगारि सकत नहिं, मायाशक्ति गुपाल की।  
<a id="line-5"></a>जिनके युगल-चरन परसत मन, पावत रति नंदलाल की।  
<a id="line-6"></a>लखत “कृपालु” अनुग्रह गुरु के, लीला लाड़लि लाल की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

कृपालु गुरुदेव पर बार-बार बलिहार जाता हूँ उनके दिव्य उपदेशों को सुनकर अविद्या की गाँठ खुल जाती है। उनकी कृपा हो जाने पर कलिकाल का प्रभाव जाता रहता है। उनके दास बन जाने पर अतिशय प्रबल मायाशक्ति बाल तक बाँका नहीं कर सकती। उनके युगल चरणों को भक्तिपूर्वव स्पर्श करने पर कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि सद्गुरु की कृपा से मैं सदा श्यामा श्याम की नयी-नयी लीलाओं का रस लेता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 51

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
