सद्गुरु-माधुरी · पद 3
जयति जय, जय सद्गुरु महराज।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jayati jaya, jaya sadguru maharāja
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जयति जय, जय सद्गुरु महराज।
2छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज।
3बिनु कारण करुणाकर जाकर अस स्वभाव भल भ्राज।
4बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज।
5डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु-ब्रजराज।
6हौं “कृपालु” गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज॥
हिन्दी भावार्थ
गुरुदेव की जय हो, जय हो। प्रेमानन्द में निमग्न गुरुदेव मानो श्यामा श्याम के मूर्तिमान रसावतार ही हैं। उनका सहज स्वभाव ही है अकारण करुणा करके जीवोद्धार करना। गुरुदेव ऐसे रसिक शिरोमणि हैं कि पतितों को भी हठात् प्रेमानन्द प्रदान कर देते हैं उस रस में स्वयं भी डूब जाते हैं साथ ही शरणागत शिष्य को भी डुबा देते हैं। 'कृपालु' कहते हैं मैं तो उन सद्गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करके आज धन्य हो गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 49-50