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RADHEY RADHEY

सद्गुरु-माधुरी · पद 2

अरे मन! सुन गुरु-तत्व-विचार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! suna guru-tatva-vichāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन! सुन गुरु-तत्व-विचार।

2"गुं रौतीति गुरुः, व्युत्पत्तिहिं, गुरु मेटत अँधियार।

3यद्यपि गुरु-गोविन्द दोउ इक, कह वेदादि पुकार।

4दोउन महँ कोउ मिलइ मिलइ तब, प्रेम-सुधा-रससार।

5तदपि रहस्य सुनहु मन! गुरु बिन, मिलइ न नंदकुमार।

6पै “कृपालु” बिनु हरिहिं मिलइ गुरु, जय सद्गुरु सरकार॥

हिन्दी भावार्थ

एक तत्त्वज्ञ अपने मन से कहता है कि हे मन! सद्गुरु तत्व का महत्व सुन। जो अज्ञानान्धकार को मिटा दे वही गुरु है। यद्यपि वेदादि के अनुसार गुरु एवं हरि दोनों एक ही हैं एवं इन दोनों में कोई भी कृपा कर दे तो प्रेम सुधा रस मिल जाता है। फिर भी एक रहस्य है, वह यह कि बिना गुरु के हरि की प्राप्ति असम्भव है, कृपालु कहते हैं जबकि बिना हरि के ही गुरु की प्राप्ति एवं प्रेमानन्द की प्राप्ति सम्भव है। ऐसे सद्गुरु को बार-बार नमस्कार हो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 49