सद्गुरु-माधुरी · पद 1
अस रस महँ, मोहिं सद्गुरु बोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: asa rasa mahaṁ, mohiṁ sadguru borī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अस रस महँ, मोहिं सद्गुरु बोरी।
2धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष रस, सबै लगत मो फीको री।
3कहँ लौं कह बैकुण्ठ-लोकहूँ, रुचि नहिं टुक सपनेहुँ मोरी।
4इक भावत चंचल नँदनंदन, इक वृषभानुलली भोरी।
5गिरिजा-अजा जलधिजा-दुर्लभ, पियत रास रस ब्रजखोरी।
6कह “कृपालु” अस सद्गुरु ऋण ते, उऋण न कोटि कल्प को री॥
हिन्दी भावार्थ
एक शरणागत शिष्य कहता है कि मुझे मेरे सद्गुरु ने ऐसे प्रेमरस में डुबो दिया है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थ उस रस के आगे फीके लगते हैं। कहाँ तक कहें बैकुण्ठ लोक का सुख भी स्वप्न में भी नहीं प्रिय लगता है। बस एक चंचल श्याम सुन्दर एवं भोली-भाली राधारानी ही प्रिय लगती हैं। अब मैं ब्रह्माणी, रुद्राणी, लक्ष्मी आदि से भी दुर्लभ रास-रस को ब्रज को कुंजों में निरन्तर पीता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसे सद्गुरु के ऋण से मैं करोड़ों कल्प में भी उऋण नहीं हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 48