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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 15

भजु राधे गोविन्द घनश्याम रे, भजु मन श्री राधे॥

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhaju rādhe govinda ghanashyāma re, bhaju mana shrī rādhe

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भजु राधे गोविन्द घनश्याम रे, भजु मन श्री राधे॥

2दोउ रूप-सुधा-निधि लाल-लली,

3विहरें नित मंजुल कुंज-गली।

4लखि लाजें कोटि-शत काम रे, भजु मन श्री राधे।

5दोउ रसिक शिरोमणि प्रेमधनी,

6जनु रूप-सिंगार की जोरी बनी।

7रसधार बहायो ब्रजधाम रे, भजु मन श्री राधे।

8सनकादिक भेद न पाय सके,

9कहि"नेति"जु वेदहुँ गाय थके।

10तेहि गोपी नचावें बिनु दाम रे, भजु मन श्री राधे।

11जेहि ध्यानी सुरंध्रनि ध्यान धरें,

12जेहि ज्ञानी निरंजन मानि लरें।

13तेहि अंजन बनायो ब्रजबाम रे, भजु मन श्री राधे।

14दोउ चन्द्रचकोर दोऊ हैं बने,

15बिनु बैनन नैनन बात भने।

16धनि जोरी “कृपालु” अभिराम रे, भजु मन श्री राधे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू राधे-गोविन्द-घनश्याम का निरन्तर स्मरण किया कर। ये राधा-कृष्ण दोनों ही सौंदर्य-रूपी अमृत के भंडार हैं एवं निरन्तर ही सुन्दर कुंज-गलियों में विविध प्रकार के रास-विहार करते रहते हैं। उनको देखकर करोड़ों रति और कामदेव भी लज्जित होते हैं। ये दोनों ही रसिकों के सरताज एवं प्रेम के धनिक हैं, मानो रूप एवं शृंगार की मनोहर जोड़ी बनी हुई है। ये दोनों ब्रजधाम में प्रेमरस की धारा बहाया करते हैं। ब्रह्म श्रीकृष्ण के रहस्यों को नित्य जीवन्मुक्त परमहंस सनकादिक भी नहीं समझ सके एवं चारों वेदों ने भी जिसकी महिमा को न गा सकने के कारण 'नेति-नेति' कह कर समाप्त कर दिया। उसी ब्रह्म श्रीकृष्ण को गोपियाँ बिना मूल्य के ही ब्रज की गलियों में नचाती हैं। जिस ब्रह्म श्रीकृष्ण का बड़े-बड़े ध्यानी समाधिस्थ होकर ध्यान किया करते हैं एवं जिसे ज्ञानी-जन भी निरंजन अर्थात् निर्लेप कहकर पुकार करते हैं, वही ब्रह्म ब्रज-बनिताओं की आँखों का अंजन बना हुआ है। राधा-कृष्ण ये दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के लिए चन्द्रमा तथा चकोर हैं तथा ये प्रेमरस में विभोर होकर बिना वाणी के ही नेत्रों के संकेत से बातें करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसी अनुपम जोड़ी पर मैं बलिहार जाता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 930,929