प्रकीर्ण-माधुरी · पद 14
वैदवा अनारी, नारी धर भरमावे रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: baidavā anārī, nārī dhara bharamāve re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वैदवा अनारी, नारी धर भरमावे रे।
2जाइ कहो वैदवा सों, कछु दिन पढ़ि आवे,
3रोग पहिचाने बिनु, औषधि बतावे रे।
4झूठी-मूठी बूटी दै के, घूँटी सों पिलावे मोहिं,
5अनुदिन छिन छिन दरद बढ़ावे रे।
6एरी सखी! कैसी करूँ कहाँ चली जावूँ हाय!
7जिऊँ कैसे? मरूँ कैसे? विरह सतावे रे।
8जान्यो री “कृपालु” तेरो रोग है वियोग को री,
9वैदवा है गोकुला में कान्ह जो कहावे रे॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी के माता पिता, उसे रोगग्रस्त समझकर वैद्य को बुलाकर दिखा रहे हैं। उस वैद्य को अल्पज्ञ समझ कर विरहिणी अपनी सखी से कहती है।) अरी सखी! वैद्य मूर्ख है एवं मेरी नाड़ी पकड़ कर भ्रम में पड़ रहा है। उस वैद्य से जाकर कह दे कि वह कुछ दिन और पढ़ आवे क्योंकि वह मेरे प्रेम-रोग को बिना ही समझे-बूझे शारीरिक औषधियाँ बताता है। मेरी इच्छा न होते हुए भी रोग के विपरीत घूँटी के द्वारा झूठी-मूठी औषधि पिलवाता है किन्तु मेरा प्रेम-रोग तो प्रतिक्षण बढ़ता ही जा रहा है। अरी सखी! तू ही बता कि मैं प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना किस प्रकार रहूँ? कहाँ चली जाऊँ? जीऊँ भी तो किस प्रकार? एवं मरूँ भी तो किस प्रकार? मेरे लिए विरह अत्यन्त ही दुःखदाई हो गया है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तुझे प्रियतम के वियोग का रोग है, जिसका वैद्य गोकुल वाला श्यामसुन्दर है एवं जिसकी औषधि उसका मधुर मिलन ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 931