# वैदवा अनारी, नारी धर भरमावे रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1001-M21-K014
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 14
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 478–478

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वैदवा अनारी, नारी धर भरमावे रे।  
<a id="line-2"></a>जाइ कहो वैदवा सों, कछु दिन पढ़ि आवे,  
<a id="line-3"></a>रोग पहिचाने बिनु, औषधि बतावे रे।  
<a id="line-4"></a>झूठी-मूठी बूटी दै के, घूँटी सों पिलावे मोहिं,  
<a id="line-5"></a>अनुदिन छिन छिन दरद बढ़ावे रे।  
<a id="line-6"></a>एरी सखी! कैसी करूँ कहाँ चली जावूँ हाय!  
<a id="line-7"></a>जिऊँ कैसे? मरूँ कैसे? विरह सतावे रे।  
<a id="line-8"></a>जान्यो री “कृपालु” तेरो रोग है वियोग को री,  
<a id="line-9"></a>वैदवा है गोकुला में कान्ह जो कहावे रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी के माता पिता, उसे रोगग्रस्त समझकर वैद्य को बुलाकर दिखा रहे हैं। उस वैद्य को अल्पज्ञ समझ कर विरहिणी अपनी सखी से कहती है।) अरी सखी! वैद्य मूर्ख है एवं मेरी नाड़ी पकड़ कर भ्रम में पड़ रहा है। उस वैद्य से जाकर कह दे कि वह कुछ दिन और पढ़ आवे क्योंकि वह मेरे प्रेम-रोग को बिना ही समझे-बूझे शारीरिक औषधियाँ बताता है। मेरी इच्छा न होते हुए भी रोग के विपरीत घूँटी के द्वारा झूठी-मूठी औषधि पिलवाता है किन्तु मेरा प्रेम-रोग तो प्रतिक्षण बढ़ता ही जा रहा है। अरी सखी! तू ही बता कि मैं प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना किस प्रकार रहूँ? कहाँ चली जाऊँ? जीऊँ भी तो किस प्रकार? एवं मरूँ भी तो किस प्रकार? मेरे लिए विरह अत्यन्त ही दुःखदाई हो गया है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तुझे प्रियतम के वियोग का रोग है, जिसका वैद्य गोकुल वाला श्यामसुन्दर है एवं जिसकी औषधि उसका मधुर मिलन ही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 931

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
