# भजु राधे गोविन्द घनश्याम रे, भजु मन श्री राधे॥

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1002-M21-K015
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 15
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 479–479

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भजु राधे गोविन्द घनश्याम रे, भजु मन श्री राधे॥  
<a id="line-2"></a>दोउ रूप-सुधा-निधि लाल-लली,  
<a id="line-3"></a>विहरें नित मंजुल कुंज-गली।  
<a id="line-4"></a>लखि लाजें कोटि-शत काम रे, भजु मन श्री राधे।  
<a id="line-5"></a>दोउ रसिक शिरोमणि प्रेमधनी,  
<a id="line-6"></a>जनु रूप-सिंगार की जोरी बनी।  
<a id="line-7"></a>रसधार बहायो ब्रजधाम रे, भजु मन श्री राधे।  
<a id="line-8"></a>सनकादिक भेद न पाय सके,  
<a id="line-9"></a>कहि"नेति"जु वेदहुँ गाय थके।  
<a id="line-10"></a>तेहि गोपी नचावें बिनु दाम रे, भजु मन श्री राधे।  
<a id="line-11"></a>जेहि ध्यानी सुरंध्रनि ध्यान धरें,  
<a id="line-12"></a>जेहि ज्ञानी निरंजन मानि लरें।  
<a id="line-13"></a>तेहि अंजन बनायो ब्रजबाम रे, भजु मन श्री राधे।  
<a id="line-14"></a>दोउ चन्द्रचकोर दोऊ हैं बने,  
<a id="line-15"></a>बिनु बैनन नैनन बात भने।  
<a id="line-16"></a>धनि जोरी “कृपालु” अभिराम रे, भजु मन श्री राधे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू राधे-गोविन्द-घनश्याम का निरन्तर स्मरण किया कर। ये राधा-कृष्ण दोनों ही सौंदर्य-रूपी अमृत के भंडार हैं एवं निरन्तर ही सुन्दर कुंज-गलियों में विविध प्रकार के रास-विहार करते रहते हैं। उनको देखकर करोड़ों रति और कामदेव भी लज्जित होते हैं। ये दोनों ही रसिकों के सरताज एवं प्रेम के धनिक हैं, मानो रूप एवं शृंगार की मनोहर जोड़ी बनी हुई है। ये दोनों ब्रजधाम में प्रेमरस की धारा बहाया करते हैं। ब्रह्म श्रीकृष्ण के रहस्यों को नित्य जीवन्मुक्त परमहंस सनकादिक भी नहीं समझ सके एवं चारों वेदों ने भी जिसकी महिमा को न गा सकने के कारण 'नेति-नेति' कह कर समाप्त कर दिया। उसी ब्रह्म श्रीकृष्ण को गोपियाँ बिना मूल्य के ही ब्रज की गलियों में नचाती हैं। जिस ब्रह्म श्रीकृष्ण का बड़े-बड़े ध्यानी समाधिस्थ होकर ध्यान किया करते हैं एवं जिसे ज्ञानी-जन भी निरंजन अर्थात् निर्लेप कहकर पुकार करते हैं, वही ब्रह्म ब्रज-बनिताओं की आँखों का अंजन बना हुआ है। राधा-कृष्ण ये दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के लिए चन्द्रमा तथा चकोर हैं तथा ये प्रेमरस में विभोर होकर बिना वाणी के ही नेत्रों के संकेत से बातें करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसी अनुपम जोड़ी पर मैं बलिहार जाता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 930,929

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