मान-माधुरी · पद 42
लखी मैं, नवनि ते अति मृदुताई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī maiṁ, navani te ati mṛidutāī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी मैं, नवनि ते अति मृदुताई।
2हौं नीकी जानति सखि! पी की, ही की नीकि निकाई।
3नवनी द्रवत ताप निज, प्रियतम, पर-तिय-ताप द्रवाई।
4सोऊ लखि दूरहिं ते हा हा!, कितनो सूध सुभाई।
5"को कह पिय बेपीर"वीर! जो, पीर देत बरिआई।
6अति विशाल मन-मानस उनको, अबला अमित समाई।
7कहा कहौं सखि! मन नहिं मानत, उलटो लखत खुटाई।
8अब “कृपालु” भई बेर जाहु घर, राधे भलि भरि पाई॥
हिन्दी भावार्थ
(प्यारे श्यामसुन्दर से रूठी हुई राधिका जी ललिता को ट्वयर्थक व्यंग्य भरे शब्दों में कहती हैं।) द ह सा से अरी सखी! प्रियतम का हृदय मक्खन से भी अधिक कोमल है, यह मैंने अनुभव किया है। मैं प्रियतम के हृदय की अच्छाइयों को भली-भाँति जानती हूँ, मुझसे अधिक तू क्या जाने? अरी सखी! मक्खन तो स्वार्थवश अपने ऊपर आए हुए ताप से ही पिघलता है, किन्तु प्रियतम तो दूसरी स्त्रियों (जीवों) के ताप से पिघल जाते हैं,और वह भी दूर से ही (गोलोक में ही रहते हुए)। अहा हा! कितने सरल हैं। अरी सखी! प्रियतम को कौन बेपीर कह सकता है, जबकि वह सभी को पीड़ा (प्रेम) बाँटा करते हैं प्रियतम का हृदय अत्यन्त ही विशाल है क्योंकि उसमें अनन्त स्त्रियाँ (जीव) शरण पा लेती हैं। अरी सखी! क उनमें उपरोक्त सभी अलौकिक गुण हैं, फिर भी मेरा मन तो उल्टे अवगुण ही देखता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी ललिता! अब तुझे बड़ी देर हो चुकी है, अपने घर जा। राधिका का तो उनसे भली-भाँति पेट भर चुका है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 656-657