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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 41

मानिनी, मान मान अब मान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māninī!, māna māna aba māna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मानिनी, मान मान अब मान।

2तुम बिन मोहन रहि न सकत छिन, जान जान जिय जान।

3पल पल पंथ निहारत आरत, कान्ह कान्ह तव कान्ह।

4रोम-रोम रमि रह्यो गौर-तनु, ध्यान ध्यान नित ध्यान।

5पलकनि अटकि कछुक पल परखत, प्रान प्रान सुनु प्रान।

6सुनि “कृपालु” नहि रह्यो मान को, भान भान अब भान॥

हिन्दी भावार्थ

(ललिता सखी मानिनी वृषभानुनन्दिनी को मनाती हुई कहती हैं।) हे मानिनी राधिके! मैं बार-बार कहती हूँ कि तू अब मेरी बात मान ले। तुम्हारे बिना श्यामसुन्दर एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। इस बात को पक्की समझना। तुम्हारा प्रियतम व्याकुल होकर क्षण-क्षण में तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा है। उसके रोम-रोम में तुम्हारे ही गौर शरीर का ध्यान रमा हुआ है। उनके प्राण आँखों की पलकों में अटककर मानो अब प्रतीक्षा करने में असमर्थ-से हो रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं प्रियतम की ऐसी दुःखद अवस्था को देखकर किशोरी जी अपना मान भूलकर प्रेमविभोर हो गयौं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 655-656