मान-माधुरी · पद 40
कुँवरि बिनु, प्रियतम करत विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari binu, priyatama karata vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि बिनु, प्रियतम करत विचार।
2ललिता गई मनावन अबहीं, अइहैं भानुदुलार।
3कछुक लजाय कछुक बतरैहैं, करिहैं नहिं दृग चार।
4पुनि हौं, ह्वै अधीर भुज भरिहौं, कहिहौं,"सुनु सुकुमार"।
5"भलो बुरो जैसो हूँ तुम्हरो, तुमहिं निभावन-हार"।
6यह सुनि रोम रोम लपटैहैं, कहि"हा! प्राणाधार"।
7इमि “कृपालु” करि ध्यान गिरे हरि, मुर्छित धरणि मझार॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी के वियोग में एवं किशोरी जी को मजाने के लिये ललिता के चले जाने के बाद, प्रियतम श्यामसुन्दर भावनाओं में विचरते हुए विचार करते हैं।) किशोरी जी के बिना प्रियतम श्यामसुन्दर विचार करते हैं कि किशोरी जी को ललिता सखी मजाने गयी हैं इसलिए किशोरी जी अभी शीघ्र ही आयेंगी एवं आकर कुछ लजाती हुई संकोच के कारण थोड़ी-थोड़ी बात कहेंगी तथा अधिक समय बाद मिलने के कारण सहसा आँखों से आँखें, नहीं मिलायेंगी। तब मैं अत्यन्त अधीर होकर प्यारी जी से लिपट जाऊँगा और कहूँगा, हे प्राणप्रिये! सुनो, मैं भला-बुरा जैसा भी हूँ तुम्हारा ही तो हूँ, तुम्हीं मेरे गुणों अवगुणों पर विचार न करके निभाने वाली हो मेरे इस हृदय-विदारक वचन को सुनकर, प्रेम-विभोर भानुनन्दिनी 'हा प्राणाधार! ऐसा मत कहो'कहती हुई सम्पूर्ण अंगों से मेरा आलिंगन करेंगी। कृपालु' कहते हैं कि प्रियतम श्यामसुन्दर भावनाओं में ही इस प्रकार मधुर-मिलन के आनन्द का अनुभव करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 654-655