मान-माधुरी · पद 39
अरी ओ ललिते! सुनु इक बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī o lalite! sunu ika bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी ओ ललिते! सुनु इक बात।
2गह्यो मान वृषभानुनंदिनी, हौं डरपत तहँ जात।
3तू मनाय दे प्राण सखी मम, विरह जरावत गात।
4बिनु देखे मोहिं चैन न इक छिन, इक पल कलप लखात।
5रहिहौं ऋणी तिहारो युग युग, करिहौं तव मन-भात।
6माँगत भीख प्राण की, इमि कहि, पर्यो चरण बिलखात।
7सुनि “कृपालु” सखि चली मनावन, मंद मंद मुसकात॥
हिन्दी भावार्थ
म (किशोरी जी के रूठ जाने पर ठाकुर जी मजाने के लिए ललिता सखी से कहते हैं।) अरी ओ ललिते! मेरी एक प्रार्थना सुन ले। किशोरी जी ने मान कर लिया है और मुझे उनके पास मजाने के लिए जाने में भी डर लगता है। तू मेरी प्राणप्रिय सखी है अतएव मुझे अपना समझकर मेरा यह कार्य कर दे। विरह की आग मुझे जला रही है। बिना वृषभानुनन्दिनी के देखे एक क्षण भी मुझे कल्प के समान दुःखदाई लग रहा है। अरी ललिते! मैं अनन्त युगों तक तेरा ऋणी रहूँगा एवं तू जो कुछ भी कहेगी वही करूँगा। मैं तुझसे अपने जाते हुए प्राणों की भीख माँग रहा हूँ। ऐसा कहकर प्रियतम श्यामसुन्दर ललिता सखी के चरणों को पकड़कर रोने लगे। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रियतम की इस दुःखद अवस्था को देखकर ललिता सखी किशोरी जी को मजाने के लिये मन्द-मन्द मुस्कराते हुए चल दी। (मुस्कराने का अभिप्राय यह था कि हमारी तरह आज प्रियतम को भी विरह के दुःख का पता चल रहा है। दूसरा अभिप्राय यह भी था कि वैसे तो बड़े कटे छटे रहते हैं किन्तु आज अपने स्वार्थ के लिये कितने दीन बन गये हैं!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 653-654