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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 38

पिय बिनु, पिय सों तिय बतरात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya binu, piya soṁ tiya batarāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिय बिनु, पिय सों तिय बतरात।

2भावावेश-समाधि-मगन मन, विहरति तिय दिन-रात।

3कबहुँक उठि कह"तुम अति निष्ठुर, तो सन करहुँ न बात"।

4कबहुँक कह,"कितने प्यारे तुम, सुंदर श्यामल गात"।

5कबहुँक उर लपटाति कहति कछु, कबहुँक पुनि रिसियात।

6लतन “कृपालु” लखति ललितादिक, लखि लखि हिय हुलसात॥

हिन्दी भावार्थ

(प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में श्रीकिशोरी जी ह भावावेश की अवस्था में मधुर-मिलन का अनुभव करती प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना ही विरहिणी प्रियतम से बाते करती हैं एवं भावावेश-प्रेम-समाधि में निमग्न होकर विहार करती हैं। कभी तो उठकर कहती हैं, 'तुम बड़े बेपीर हो, अब मैं तुमसे कभी बात नहीं करूँगी,''एवं कभी यह कहती हैं हे प्यारे श्यामसुन्दर! तुम कितने प्यारे हो,''कभी मानो उनके हृदय से लिपटकर कुछ कहती हुई सी मालूम पड़ती है तथा कभी उनसे मान भी कर लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस दिव्य मिलन को ललितादिक सखियाँ लताओं के बीच से देखती हुईं हृदय में प्रेम की हिलोरें लेने लगीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 652-653