# पिय बिनु, पिय सों तिय बतरात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0691-M16-K038
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 38
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 324–325

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिय बिनु, पिय सों तिय बतरात।  
<a id="line-2"></a>भावावेश-समाधि-मगन मन, विहरति तिय दिन-रात।  
<a id="line-3"></a>कबहुँक उठि कह"तुम अति निष्ठुर, तो सन करहुँ न बात"।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक कह,"कितने प्यारे तुम, सुंदर श्यामल गात"।  
<a id="line-5"></a>कबहुँक उर लपटाति कहति कछु, कबहुँक पुनि रिसियात।  
<a id="line-6"></a>लतन “कृपालु” लखति ललितादिक, लखि लखि हिय हुलसात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में श्रीकिशोरी जी ह भावावेश की अवस्था में मधुर-मिलन का अनुभव करती प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना ही विरहिणी प्रियतम से बाते करती हैं एवं भावावेश-प्रेम-समाधि में निमग्न होकर विहार करती हैं। कभी तो उठकर कहती हैं, 'तुम बड़े बेपीर हो, अब मैं तुमसे कभी बात नहीं करूँगी,''एवं कभी यह कहती हैं हे प्यारे श्यामसुन्दर! तुम कितने प्यारे हो,''कभी मानो उनके हृदय से लिपटकर कुछ कहती हुई सी मालूम पड़ती है तथा कभी उनसे मान भी कर लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस दिव्य मिलन को ललितादिक सखियाँ लताओं के बीच से देखती हुईं हृदय में प्रेम की हिलोरें लेने लगीं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 652-653

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
