# लखी मैं, नवनि ते अति मृदुताई।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0695-M16-K042
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 42
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 326–327

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखी मैं, नवनि ते अति मृदुताई।  
<a id="line-2"></a>हौं नीकी जानति सखि! पी की, ही की नीकि निकाई।  
<a id="line-3"></a>नवनी द्रवत ताप निज, प्रियतम, पर-तिय-ताप द्रवाई।  
<a id="line-4"></a>सोऊ लखि दूरहिं ते हा हा!, कितनो सूध सुभाई।  
<a id="line-5"></a>"को कह पिय बेपीर"वीर! जो, पीर देत बरिआई।  
<a id="line-6"></a>अति विशाल मन-मानस उनको, अबला अमित समाई।  
<a id="line-7"></a>कहा कहौं सखि! मन नहिं मानत, उलटो लखत खुटाई।  
<a id="line-8"></a>अब “कृपालु” भई बेर जाहु घर, राधे भलि भरि पाई॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(प्यारे श्यामसुन्दर से रूठी हुई राधिका जी ललिता को ट्वयर्थक व्यंग्य भरे शब्दों में कहती हैं।) द ह सा से अरी सखी! प्रियतम का हृदय मक्खन से भी अधिक कोमल है, यह मैंने अनुभव किया है। मैं प्रियतम के हृदय की अच्छाइयों को भली-भाँति जानती हूँ, मुझसे अधिक तू क्या जाने? अरी सखी! मक्खन तो स्वार्थवश अपने ऊपर आए हुए ताप से ही पिघलता है, किन्तु प्रियतम तो दूसरी स्त्रियों (जीवों) के ताप से पिघल जाते हैं,और वह भी दूर से ही (गोलोक में ही रहते हुए)। अहा हा! कितने सरल हैं। अरी सखी! प्रियतम को कौन बेपीर कह सकता है, जबकि वह सभी को पीड़ा (प्रेम) बाँटा करते हैं प्रियतम का हृदय अत्यन्त ही विशाल है क्योंकि उसमें अनन्त स्त्रियाँ (जीव) शरण पा लेती हैं। अरी सखी! क उनमें उपरोक्त सभी अलौकिक गुण हैं, फिर भी मेरा मन तो उल्टे अवगुण ही देखता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी ललिता! अब तुझे बड़ी देर हो चुकी है, अपने घर जा। राधिका का तो उनसे भली-भाँति पेट भर चुका है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 656-657

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
