लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 23

सखी कछु, प्रियतम बात सुनाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī kachhu, priyatama bāta sunāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी कछु, प्रियतम बात सुनाय।

2सुनु सखि! तन कारो मन कारो, कारो करतब वाय।

3सखि कह हौं मानत सब कारो, तबहुँ तोहिं मनभाय।

4तू न मान भल सुनु सखि! वाकी, बात न नेकु सुहाय।

5सखि कह हौं मानत सुनि बातन, विरह व्यथा बढ़ि जाय।

6कह “कृपालु” सखि चलु हटु तू तो, आपनि बात बताय॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखि दूसरी सखि से कहती है-''अरी सखि! प्रियतम श्यामसुन्दर की कुछ बात सुना दे''। सखि ने व्यंग्य भरे शब्दों में कहा-''उसका शरीर काला है, मन काला है एवं करतूत भी काली है''। प्रथम सखि ने कहा ''मैं मानती हूँ उसका सब काला है, किन्तु फिर भी तेरे रोम-रोम में एकमात्र वही समाया हुआ है''। दूसरी सखि ने कहा-''अरी सखि! तू भले ही मेरी बात पर विश्वास न करे, किन्तु मुझे तो उसकी चर्चा स्वप्न में भी नहीं सुहाती''। प्रथम सखि ने कहा ''तू सच कहती है, क्योंकि प्रियतम की चर्चा सुनकर तेरे विरह की आग और भी धधकने लगती है।'' 'कृपालु' के शब्दों में नारी जाति की स्वाभाविक लज्जा युक्त अटपटी अदा से दूसरी सखि ने कहा, ''चल हट तू तो अपनी बात बता रही है। तेरे ही साथ ऐसा होता होगा''।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 523-524