लीला-माधुरी · पद 22
श्याम सखी अति सुघर नवेली,
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ‘shyāmasakhī’ ati sughara navelī, bhānulalihiṁ churiyāṁ pahirāvati
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम सखी अति सुघर नवेली,
2भानुललिहिं चुरियाँ पहिरावति।
3लली कमल-कोमल-कर-अँगुरिन,
4चापि सकोरति अति मन भावति।
5पुलक, स्वेद, तनु थर-थर काँपत,
6हँसि-हँसि प्यारी सों बतरावति।
7उमग्यो परत प्रेम-रस-अंबुधि,
8बिनु चुरियाँ चुरियान पिन्हावति।
9उठि सँभारि सुधि-देह साँवरी,
10दौरी वेगि कदली-दल लावति।
11धरि तर पात चढ़ावत पुनि पुनि,
12बेर बेर चुरियाँ चटकावति।
13प्रिया भरति मधुभरी-सिसकारी,
14मुख सकोरि भौं मोरि नचावति।
15भइ मतिभोर छुट्यो कर ते कर,
16इकटक चित्रलिखी दरसावति।
17दुहुँन केर अद्भुत गति लखि, सखि,
18ललितादिक मन विस्मय लावति।
19मुर्छित गिरी अवनि मनिहारिनि,
20"मेरी प्यारी राधे!"गावति।
21ललिता कह"यह जशुमति जाई,
22सुनी रही जो साँचु जनावति"
23"भूत भूत"कहि भजीं सखी सब,
24प्रिया पिया निज कंठ लगावति।
25अब “कृपालु” उघरे दृग-छल-दोउ,
26ललिहिं लाल बहुभाँति रिझावति॥
हिन्दी भावार्थ
( श्री श्यामसुन्दर श्याम-सखि नामक मनिहारिन के वेष में किशोरी जी को छलने जाते हैं। श्यामसुन्दर रूपी श्याम सखि सज-धजकर एवं किशोरी ज के महल में जाकर चूड़ियाँ पहना रही है। जी के कमल से भी अधिक कोमल हाथ की अंगुलियों को दबाती है एवं किशोरी जी के स्पर्श से अति आनन्द का अनुभव करती है। शरीर में रोमांच, स्वेद एवं कँपकँपी प्रकट हो रही है, फिर भी प्रेम को छिपाती हुई हँस-हँसकर किशोरी जी से घरेलू बातें करती है, किन्तु प्रेम का समुद्र उमड़कर उन्हें विभोर कर देता है। इसके परिणामस्वरूप यह मनिहारिन बिना चूड़ियों के ही हाथ-में-हाथ पहना रही है। इतनी भूल गई कि चूड़ी तो पृथ्वी पर पड़ी है एवं अपने हाथ को चूड़ी समझकर किशोरी जी के हाथ में पहना रही है। थोड़ी देर बाद समाधि खुली तब तुरन्त ही इस प्रेम के गुप्त रहस्य को छिपाने के लिए खड़ी हो गयी एवं दौड़कर वाटिका से केलों के कोमल पत्ते ले आयी। नीचे रखकर ऊपर से बार-बार चूड्याँ पहजाने लगी किन्तु बार-बार चूड़ियाँ फूट जाती हैं (अभ्यास न होने के कारण एवं प्रेम-विभोर होने के कारण)। अत्यन्त ही मीठी सिसकी भरती हैं एवं मुख को सिकोउ़कर भौंहों को नचाती हैं। होता है।) श्याम सखि ने अभी तक किशोरी जी की आँख से-आँख नहीं मिलाई थी, किन्तु किशोरी जी को सिसकी भरते हुए देखकर पत्थर की मूर्ति की तरह एकटक देखने लगी एवं किशोरी जी के हाथ से, प्रेम-अधीर होने के कारण उसका हाथ छूट गया। देखकर ललिता आदि सखियों के मन में आश्चर्य होने लगा। कुछ क्षण पश्चात् ही वह मनिहारिन श्याम सखि मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी एवं भावावेश की अवस्था में 'मेरी प्यारी राधे'मेरी प्यारी राधे'की रटना स्वयं ही लगाने लगी। तब ललिता ने कहा, अरी! यह तो यशोदा की बेटी है। लोगों ने सुना था कि एक बेटी हुई थी किन्तु उसे तो कंस ने मार डाला था, तो क्या यह भूत बनकर आई है? ललिता के कहने पर सभी सखियाँ एक-दूसरे से भूत-भूत कहती हुई भाग गयीं। लिया कि यह तो छलिया श्यामसुन्दर है। हुए प्रियतम को गोद में. उठा लिया। जब थोड़ी देर बाद श्यामसुन्दर की मूर्च्छा समाप्त हुई तब उन्होंने देखा कि मुझे तो लोगों ने पहचान लिया। किशोरी जी को अनेक लाड्-प्यार की बातों से रिझाने लगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 520-523