# श्याम सखी अति सुघर नवेली,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0544-M12-K022
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 22
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 254–256

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्याम सखी अति सुघर नवेली,  
<a id="line-2"></a>भानुललिहिं चुरियाँ पहिरावति।  
<a id="line-3"></a>लली कमल-कोमल-कर-अँगुरिन,  
<a id="line-4"></a>चापि सकोरति अति मन भावति।  
<a id="line-5"></a>पुलक, स्वेद, तनु थर-थर काँपत,  
<a id="line-6"></a>हँसि-हँसि प्यारी सों बतरावति।  
<a id="line-7"></a>उमग्यो परत प्रेम-रस-अंबुधि,  
<a id="line-8"></a>बिनु चुरियाँ चुरियान पिन्हावति।  
<a id="line-9"></a>उठि सँभारि सुधि-देह साँवरी,  
<a id="line-10"></a>दौरी वेगि कदली-दल लावति।  
<a id="line-11"></a>धरि तर पात चढ़ावत पुनि पुनि,  
<a id="line-12"></a>बेर बेर चुरियाँ चटकावति।  
<a id="line-13"></a>प्रिया भरति मधुभरी-सिसकारी,  
<a id="line-14"></a>मुख सकोरि भौं मोरि नचावति।  
<a id="line-15"></a>भइ मतिभोर छुट्यो कर ते कर,  
<a id="line-16"></a>इकटक चित्रलिखी दरसावति।  
<a id="line-17"></a>दुहुँन केर अद्भुत गति लखि, सखि,  
<a id="line-18"></a>ललितादिक मन विस्मय लावति।  
<a id="line-19"></a>मुर्छित गिरी अवनि मनिहारिनि,  
<a id="line-20"></a>"मेरी प्यारी राधे!"गावति।  
<a id="line-21"></a>ललिता कह"यह जशुमति जाई,  
<a id="line-22"></a>सुनी रही जो साँचु जनावति"  
<a id="line-23"></a>"भूत भूत"कहि भजीं सखी सब,  
<a id="line-24"></a>प्रिया पिया निज कंठ लगावति।  
<a id="line-25"></a>अब “कृपालु” उघरे दृग-छल-दोउ,  
<a id="line-26"></a>ललिहिं लाल बहुभाँति रिझावति॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

( श्री श्यामसुन्दर श्याम-सखि नामक मनिहारिन के वेष में किशोरी जी को छलने जाते हैं। श्यामसुन्दर रूपी श्याम सखि सज-धजकर एवं किशोरी ज के महल में जाकर चूड़ियाँ पहना रही है। जी के कमल से भी अधिक कोमल हाथ की अंगुलियों को दबाती है एवं किशोरी जी के स्पर्श से अति आनन्द का अनुभव करती है। शरीर में रोमांच, स्वेद एवं कँपकँपी प्रकट हो रही है, फिर भी प्रेम को छिपाती हुई हँस-हँसकर किशोरी जी से घरेलू बातें करती है, किन्तु प्रेम का समुद्र उमड़कर उन्हें विभोर कर देता है। इसके परिणामस्वरूप यह मनिहारिन बिना चूड़ियों के ही हाथ-में-हाथ पहना रही है। इतनी भूल गई कि चूड़ी तो पृथ्वी पर पड़ी है एवं अपने हाथ को चूड़ी समझकर किशोरी जी के हाथ में पहना रही है। थोड़ी देर बाद समाधि खुली तब तुरन्त ही इस प्रेम के गुप्त रहस्य को छिपाने के लिए खड़ी हो गयी एवं दौड़कर वाटिका से केलों के कोमल पत्ते ले आयी। नीचे रखकर ऊपर से बार-बार चूड्याँ पहजाने लगी किन्तु बार-बार चूड़ियाँ फूट जाती हैं (अभ्यास न होने के कारण एवं प्रेम-विभोर होने के कारण)। अत्यन्त ही मीठी सिसकी भरती हैं एवं मुख को सिकोउ़कर भौंहों को नचाती हैं। होता है।) श्याम सखि ने अभी तक किशोरी जी की आँख से-आँख नहीं मिलाई थी, किन्तु किशोरी जी को सिसकी भरते हुए देखकर पत्थर की मूर्ति की तरह एकटक देखने लगी एवं किशोरी जी के हाथ से, प्रेम-अधीर होने के कारण उसका हाथ छूट गया। देखकर ललिता आदि सखियों के मन में आश्चर्य होने लगा। कुछ क्षण पश्चात् ही वह मनिहारिन श्याम सखि मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी एवं भावावेश की अवस्था में 'मेरी प्यारी राधे'मेरी प्यारी राधे'की रटना स्वयं ही लगाने लगी। तब ललिता ने कहा, अरी! यह तो यशोदा की बेटी है। लोगों ने सुना था कि एक बेटी हुई थी किन्तु उसे तो कंस ने मार डाला था, तो क्या यह भूत बनकर आई है? ललिता के कहने पर सभी सखियाँ एक-दूसरे से भूत-भूत कहती हुई भाग गयीं। लिया कि यह तो छलिया श्यामसुन्दर है। हुए प्रियतम को गोद में. उठा लिया। जब थोड़ी देर बाद श्यामसुन्दर की मूर्च्छा समाप्त हुई तब उन्होंने देखा कि मुझे तो लोगों ने पहचान लिया। किशोरी जी को अनेक लाड्-प्यार की बातों से रिझाने लगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 520-523

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
