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RADHEY RADHEY

लीला-माधुरी · पद 21

यमुन जल, विहरत नंदकुमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yamuna jala, biharata nandakumāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यमुन जल, विहरत नंदकुमार।

2घनन घनन घन सघन गगन पै, गरजि तरजि बलिहार।

3चमचम चमकति चपल चंचला, रिमझिम परत फुहार।

4सखि परिकर दोउ कर हरि पर कर, जल अँजुरिन बौछार।

5घूमि घूमि झुकि झूमि झूमि हरि, हूमि हूमि जल डार।

6नाचत मनहुँ मयूरिन संग लै, पंख मयूर पसार।

7हार मानि लइ जब “कृपालु” हरि, हँसीं सबै ब्रजनार॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर यमुना के जल में विहार कर रहे हैं। आकाश में घने बादल घनन घनन की ध्वनि करते हुए गरज कर डराते हुये से बहुत सुन्दर लग रहे हैं। चंचल चपला चमचम चमक रही है एवं नन्हीं नन्हीं बूँदों से जल बरस रहा है। सखियों का समुदाय दोनों हाथों से श्यामसुन्दर के ऊपर अँजुली से जल की बौछार कर रहा है। श्यामसुन्दर चारों ओर घूमते हुये झुक-झुक कर, झूम-झूम कर, हूम-हूम कर अकेले ही सबके ऊपर जल फेंक रहे हैं। ऐसा लगता है मानो मोरनियों को साथ लेकर कोई मोर पंख फैलाकर नाच रहा है। कृपालु कहते हैं कि जब श्यामसुन्दर ने जल फेंकते-फैंकते थक कर अपनी हार मान ली तब समस्त सखियाँ हँसने लगीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 519-520