# यमुन जल, विहरत नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0543-M12-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 254–254

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>यमुन जल, विहरत नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>घनन घनन घन सघन गगन पै, गरजि तरजि बलिहार।  
<a id="line-3"></a>चमचम चमकति चपल चंचला, रिमझिम परत फुहार।  
<a id="line-4"></a>सखि परिकर दोउ कर हरि पर कर, जल अँजुरिन बौछार।  
<a id="line-5"></a>घूमि घूमि झुकि झूमि झूमि हरि, हूमि हूमि जल डार।  
<a id="line-6"></a>नाचत मनहुँ मयूरिन संग लै, पंख मयूर पसार।  
<a id="line-7"></a>हार मानि लइ जब “कृपालु” हरि, हँसीं सबै ब्रजनार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर यमुना के जल में विहार कर रहे हैं। आकाश में घने बादल घनन घनन की ध्वनि करते हुए गरज कर डराते हुये से बहुत सुन्दर लग रहे हैं। चंचल चपला चमचम चमक रही है एवं नन्हीं नन्हीं बूँदों से जल बरस रहा है। सखियों का समुदाय दोनों हाथों से श्यामसुन्दर के ऊपर अँजुली से जल की बौछार कर रहा है। श्यामसुन्दर चारों ओर घूमते हुये झुक-झुक कर, झूम-झूम कर, हूम-हूम कर अकेले ही सबके ऊपर जल फेंक रहे हैं। ऐसा लगता है मानो मोरनियों को साथ लेकर कोई मोर पंख फैलाकर नाच रहा है। कृपालु कहते हैं कि जब श्यामसुन्दर ने जल फेंकते-फैंकते थक कर अपनी हार मान ली तब समस्त सखियाँ हँसने लगीं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 519-520

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
