लीला-माधुरी · पद 2
अरी वो, माला बेचनिहार!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī vo, mālā bechanihāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी वो, माला बेचनिहार!
2हँसि कह लाली बनमाली ते, डाली शीश उतार।
3कहा नाम? काकी बेटी तू? को तिहार घरवार?।
4नाँव हमार साँवरी मालिनि, नहिं पितु नहिं भरतार।
5घूँघट के पट खोल मलिनियाँ, मो ढिंग नेकु निहार।
6लली लजीली मालिनि लखि चट, घूँघट पट दिय टार।
7घूँघट के पट हटत दुहुँन दृग, भये अचानक चार।
8बेसुध कह मालिनि"हा राधे!""हा वृषभानुदुलार"।
9उत मालिनि कहँ लखि लालिहुँ कह,"हा पिय नंदकुमार"।
10ललिता ताड़ि तबै भेंटन मिस, परसेउ कंचुकि भार।
11"छली लली छलिया, कह ललिता, ह्वै गयो बंटाढार"।
12सब “कृपालु” भजि जाहु छलै न तु, सबै छलिन सरदार॥
हिन्दी भावार्थ
मालिनी भेष बनाये हुए श्यामसुन्दर से किशोरी जी कहती हैं, अरी ओ माला बेचने वाली! अपनी फूलों की डाली नीचे उतार। तेरा नाम क्या है, तू किसकी बेटी है, और तेरा पति कौन है? मालिन ने कहा मेरा नाम साँवरी मालिन है, मेरे पिता एवं पति कोई नहीं हैं। किशोरी जी ने कहा, जरा घुँघट खोलकर मेरी ओर देख! मालिन को लजीली समझ कर किशोरी जी ने उसका घूँघट स्वयं खोल दिया। घूँघट खुलते ही अचानक दोनों की आँखें चार हो गयीं एवं बेसुध होकर मालिन 'हा राधे! हा वृषभानुदुलारी!!' ऐसा करने लगी। उस मालिन को देखकर किशोरी जी भी 'हा प्रियतम! नन्दकुमार!!' ऐसा कहने लगीं। ललिता ने तभी कुछ ताड़ कर भेंटने के बहाने मालिन की कंचुकि का स्पर्श करके सब भेद जान लिया। ललिता ने कहा कि अरी सखियों! यह छलिया है, किशोरी जी छली गयीं, गजब हो गया। इतने में 'कृपालु' ने कहा सब लोग भाग जाओ, नहीं तो यह छलियों का सरदार सबको छल लेगा। इस प्रकार प्रिया-प्रियतम को एकांत मिल गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 501-502