# अरी वो, माला बेचनिहार!

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0524-M12-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 243–244

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी वो, माला बेचनिहार!  
<a id="line-2"></a>हँसि कह लाली बनमाली ते, डाली शीश उतार।  
<a id="line-3"></a>कहा नाम? काकी बेटी तू? को तिहार घरवार?।  
<a id="line-4"></a>नाँव हमार साँवरी मालिनि, नहिं पितु नहिं भरतार।  
<a id="line-5"></a>घूँघट के पट खोल मलिनियाँ, मो ढिंग नेकु निहार।  
<a id="line-6"></a>लली लजीली मालिनि लखि चट, घूँघट पट दिय टार।  
<a id="line-7"></a>घूँघट के पट हटत दुहुँन दृग, भये अचानक चार।  
<a id="line-8"></a>बेसुध कह मालिनि"हा राधे!""हा वृषभानुदुलार"।  
<a id="line-9"></a>उत मालिनि कहँ लखि लालिहुँ कह,"हा पिय नंदकुमार"।  
<a id="line-10"></a>ललिता ताड़ि तबै भेंटन मिस, परसेउ कंचुकि भार।  
<a id="line-11"></a>"छली लली छलिया, कह ललिता, ह्वै गयो बंटाढार"।  
<a id="line-12"></a>सब “कृपालु” भजि जाहु छलै न तु, सबै छलिन सरदार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मालिनी भेष बनाये हुए श्यामसुन्दर से किशोरी जी कहती हैं, अरी ओ माला बेचने वाली! अपनी फूलों की डाली नीचे उतार। तेरा नाम क्या है, तू किसकी बेटी है, और तेरा पति कौन है? मालिन ने कहा मेरा नाम साँवरी मालिन है, मेरे पिता एवं पति कोई नहीं हैं। किशोरी जी ने कहा, जरा घुँघट खोलकर मेरी ओर देख! मालिन को लजीली समझ कर किशोरी जी ने उसका घूँघट स्वयं खोल दिया। घूँघट खुलते ही अचानक दोनों की आँखें चार हो गयीं एवं बेसुध होकर मालिन 'हा राधे! हा वृषभानुदुलारी!!' ऐसा करने लगी। उस मालिन को देखकर किशोरी जी भी 'हा प्रियतम! नन्दकुमार!!' ऐसा कहने लगीं। ललिता ने तभी कुछ ताड़ कर भेंटने के बहाने मालिन की कंचुकि का स्पर्श करके सब भेद जान लिया। ललिता ने कहा कि अरी सखियों! यह छलिया है, किशोरी जी छली गयीं, गजब हो गया। इतने में 'कृपालु' ने कहा सब लोग भाग जाओ, नहीं तो यह छलियों का सरदार सबको छल लेगा। इस प्रकार प्रिया-प्रियतम को एकांत मिल गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 501-502

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
