श्रीराधा-माधुरी · पद 47
श्री राधे जू को, ऐसो है दरबार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhejū ko, aiso hai darabāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधे जू को, ऐसो है दरबार।
2जैसो नव-नीरद-तनु श्यामहुँ, नहिं दरबार उदार।
3मार्यो चोंच जयंत जबै तब, राम धनुष सर मार।
4जब लौ कह्यो न"त्राहि त्राहि"तेहि, नहिं छोड़्यो सरकार।
5क्षमेउ राक्षसिन अघ अक्षम इत, बरज्यो पवन कुमार।
6जासु “कृपालु” उदार सुभायन, शूर्पणखा भइ नार॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी का दरबार जितना उदार है उतना उदार दरबार श्यामसुन्दर का भी नहीं है। माँगे ही क्षमा करते हुए हनुमान जी को प्रथम ही रोक दिया। कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जिस शूर्पणखा ने रामावतार में किशोरी जी के विरुद्ध क्रान्ति की, उसी को कृष्णावतार में कुब्जा बनाकर श्रीकृष्ण ने प्रेयसी बनने का सौभाग्य प्रदान किया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 471-472