श्रीराधा-माधुरी · पद 46
श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhejū ko, adhādhundha darabāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार।
2जिन वनचरिन आचरन कुत्सित, जग जेहि कह ब्यभिचार।
3तिन कहँ निज सहचरि करि हरि सों, करवावति मनुहार।
4जेहि रासहिं तरसति"कमला"सी, तप करि-करि गइ हार।
5तेहि वनचरिहिं सखिन किय रासहिं, को अस सरल उदार।
6कह “कृपालु” यह जानि गहहु मन! शरण गौर सरकार॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी के दरबार में छप्पर-फाड़ कृपा होती है। जिन वनचारियों का आचरण निन्दनीय था, संसार जिसे व्यभिचार की संज्ञा देता है, (पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को म रूप में न जानते हुए भी पर-पुरुष मानकर ही अनन्य-प्रेम किया। जिस प्रकार औषधि अनजाने में भी पूर्ण लाभ देती है उसी प्रकार गोपियों को भी भगवल्लाभ हुआ) किशोरी जी ने उन वनचारियों को अपनी सहचरी बनाया एवं ब्रह्म श्याम से भी उनकी खुशामद करवायी। जिस महारास में युगों तप करने पर भी महालक्ष्मी सरीखी प्रवेश तक नहीं पा सकीं, उसी रास में किशोरी जी ने उन वनचारियों को अपनी प्राणसखी बनाकर अपनी अद्वितीय उदारता का परिचय दिया। 'कृपालु' कहते हैं-अरे मन! ऐसे उदार दरबार के रहस्य को जानकर अलबेली सरकार के युगल-चरणों की शरण ग्रहण कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 471