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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 45

वृषभानु लली गुन गाइये।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vṛishabhānu lalī guna gāiye

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1वृषभानु लली गुन गाइये।

2उनकेइ चरण कमल कहँ ध्यावत, आठों याम गमाइये।

3उनकेइ नाम लेत निशिवासर, अँसुवन धार बहाइये।

4उनकेइ नित्यधाम बरसाने, पुनि पुनि आइय जाइये।

5उनकेइ परम पवित्र चरित कहँ, सुनिये और सुनाइये।

6उनकेइ जो “कृपालु” जन उन ते, प्रेम सुधा रस पाइये॥

हिन्दी भावार्थ

म अरे मन! वृषभानुनन्दिनी के गुण गाओ। उनके ही बरण-कमलों का निरन्तर ध्यान करो। उनके ही नाम का नेरन्तर गान करते हुए आँसुओं की धारा बहाओ। उनके ही रसाने धाम में बार-बार आया जाया करो। उनके ही परम वित्र चरित्र को सुनो एवं सुनाओ। 'कृपालु' कहते हैं कि जो उनके रसिक हैं, प्रेमामृत उन्हीं से प्राप्त हो सकेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 470-471