श्रीराधा-माधुरी · पद 48
श्री श्यामा जू को, ऐसो सरल सुभाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī shyāmājū ko, aiso sarala subhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री श्यामा जू को, ऐसो सरल सुभाय।
2जैसो नहिं कहुँ सुन्योँ न देख्योँ, हौं कह भुजहिं उठाय।
3जाकी नख-मणि चंद्र-चंद्रिकहिं, शंभु समाधिहिं ध्याय।
4ताके संग रैन दिन विहरति, ब्रज वनचरि समुदाय।
5तजि ब्रजराजहुँ भजति, भजत जो, क्रंदन करुण सुनाय।
6जासु “कृपालु” शरण गहि गिरिधर, अशरण शरण कहाय॥
हिन्दी भावार्थ
श्री निकुंज-विहारिणी किशोरी जी का स्वभाव इतना सरल है जितना मैंने न कहीं देखा है और न सुना ही है, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कह रहा हूँ। जिन किशोरी जी के चरणों के नाखून की चमक को निराकार-ब्रह्म के रूप में भगवान् शंकर निर्विकल्प समाधि में अनुभव करते हैं, उन्हीं किशोरी जी के साथ 'उनकी उदारता के कारण' ब्रज की निरन्तर वनचारियाँ भी नित्य विहार करती हैं। किशोरी जी की उदारता का सबसे महान् परिचय यह है कि वे अपने शरणागत के करुण क्रन्दन को सुनकर प्रियतम श्यामसुन्दर को भी छोड़कर तत्काल भागकर उसके पास जाती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि कहाँ तक कहें, किशोरी जी की शरणागति के ही परिणामस्वरूप श्यामसुन्दर को ''अशरण-शरण'' की उपाधि प्राप्त हुई है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 472-473