श्रीराधा-माधुरी · पद 42
लली मुख लखि लाजत श्रृंगार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī-mukha, lakhi lājata shṛiṅgāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली मुख लखि लाजत श्रृंगार।
2कुंतल-कुटिल कलित कलिकनि जनु, हँसि उपमान निहार।
3सघन-भंगु-भंगुर जनु बल हल, कर्षित यमुना धार।
4कनक पट्टिका भाल चंचला, जनु कच जलद मझार।
5पी मुख-चंद्र-सुधा-रस चपला, लई अमरता धार।
6दृग-अंजन जनु ब्रह्म विजय हित, दृग इषु-किण अनुहार।
7हौं “कृपालु” कहँ लौं अनुपम की, उपमा कहौं गमार॥
हिन्दी भावार्थ
किशोरी जी के मुख के सौंदर्य को देखकर शृंगार भी लज्जित हो रहा है। घुँघराले बालों से युक्त सजाई हुई सिर के ऊपर सज्जित कलियाँ मानो अलकों के समस्त उपमानों का उपहास कर रही हैं, अर्थात् घुँघराले बालों ही ने मानो कलियों का स्वरूप धारण कर लिया है। ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे कि बलराम के हल के द्वारा हस्तिनापुर में खींची हुई परन्तु ऊँची-नीची लहरों से युक्त यमुना की धारा हो। किशोरी जी के ललाट के ऊपर सोने की पट्टिका नप आभूषण इस प्रकार शोभित हो रहा है जैसे कि किशोरी जी के सिर के बाल-रूपी बादलों से उत्पन्न बिजली हो। कहे कि बिजली तो स्थिर नहीं रहती किन्तु स्वर्ण-पट्टिका तो स्थर है तो कहते हैं किशोरी जी के मुख रूपी चन्द्रमा के अन्तर्निहित अमृत को पीकर वह चंचल बिजली भी अमरता को शाप्त हो गई है, अतएव स्थिर है। मंजन मानो ब्रह्म श्रीकृष्ण को जीतने के लिए प्रत्यंचा के समान। 'कृपालु' कहते हैं कि हम अल्पज्ञ अनुपम मुख की उपमा ते हुए अपनी अल्पञ्ञता का ही परिचय दे रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 468