श्रीराधा-माधुरी · पद 43
लली सी छैल छबीली नाहिं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī sī chhaila chhabīlī nāhiṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली सी छैल छबीली नाहिं।
2जाके पटतर छैल छबीलो, नटवरहूँ न लखाहिं।
3रसिक रँगीली गुन गर्वीली, जब कबहूँ रिसियाहिं।
4रसिकन के सिरमोर श्यामहूँ, ताहि मनावन जाहिं।
5जब मानिनि नहिं मान तजैं तब, सखियन सों रिरियाहिं।
6लखत “कृपालु” गौर तनु मोहन, मन ही मन सकुचाहिं॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी जी के समान रूप रस वाली और कोई भी नहीं है। और कहाँ तक कहें जिनको समानता में रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर भी नहीं आ सकते। रसिकों की सिरमौर, गुणों की खान वृषभानुनन्दिनी जब कभी मान कर लेती हैं तब उनको मजाने के लिए रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर जाते हैं। जब मानिनी स्वामिनी जी फिर भी मान का परित्याग नहीं करतीं तब श्यामसुन्दर सखियों का निहोरा करते हैं। ई कहते हैं कि किशोरी जी के गौर वर्ण को देखकर श्यामसुन्दर मन ही मन लज्जित होते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 469