श्रीराधा-माधुरी · पद 41
लली-मुख उपमा देत लजाये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī-mukha, upamā deta lajāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली-मुख उपमा देत लजाये।
2सभय चंद्र जनु राहु-भखन-भय, राधानन बनि आये।
3चन्द्रवाल-कर-चक्रवाल जनु, अधर बिंब पद पाये।
4अर्धचंद्र सम भाल निम्न पुनि, पूर्ण चंद्र छवि छाये।
5यह मुख छवि चंद्राधिक सोहति, भ्रू-कलंक विलगाये।
6श्री मुख श्री प्रतिबिंब अंबु अरु, दर्पण कबहुँक पाये।
7पद्म चंद्र तिन तात मित्र सों, याचि दिवस निशि भाये।
8शशि “कृपालु” मिस होड़ अजहुँ जनु, शिव सिर तनुहिं तपाये॥
हिन्दी भावार्थ
अनुपम किशोरी जी के मुख की उपमा देने में मुझे लज्जा आती है। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि मानो राहु के खाने के भय से भयभीत चन्द्रमा ही किशोरी जी का मुख बन गया है। बाल चन्द्रमा की किरणों का चक्राकार मण्डल ही अरुण अधर बन गया है। किशोरी जी का ललाट आधा चन्द्रमा एवं उसके नीचे का भाग पूरे चन्द्रमा की तरह सुशोभित हो रहा है। इस प्रकार किशोरी जी का मुख डेढ़ चन्द्रमा की तरह सुशोभित हो रहा है एवं चन्द्रमा में स्थित कालिमा से भौहें बन गई हैं। कवि कहता है कि किशोरी जी के मुख का उपमान चन्द्रमा एवं कमल जो प्राय: कवि-लोग कहा करते हैं, किसी भी प्रकार नहीं हो सकता। क्योंकि चन्द्रमा को तो सौंदर्य उसके मित्र दर्पण से याचना करने पर मिला है एवं कमल को उसके पिता जल से मिला है तथा जल और दर्पण को किशोरी जी से ही सौंदर्य प्राप्त हुआ है। अर्थात् किशोरी जी ने जब कभी शीशे में अपना मुख देखा तब शीशे ने किशोरी जी के मुख का प्रतिबिंब (अक्स) चुरा लिया एवं जब कभी स्नानादि करते समय किशोरी जी के मुख का प्रतिबिंब जल में पड़ा तब जल ने चुरा लिया। इस प्रकार किशोरी जी के श्रीमुख का प्रतिबिंब चुसने वाले जल एवं शीशे से याचना करके प्राप्त किये हुए उनके पुत्र तथा मित्र स्वरूप कमल और चन्द्रमा क्रम से दिन एवं रात में सुशोभित होते हैं। फिर वे किशोरी जी के मुख का उपमान कैसे बन सकते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि चन्द्रमा तो मानो पुनः किशोरी जी के मुख की समानता करने के विचार से शंकरजी के सिर पर तपस्या कर रहा है एवं तपस्या करते करते क्षीण होकर, सोलह कला से दो कला का ही रह गया है किन्तु फिर भी अपना हठ नहीं छोड़ता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 466-467