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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 22

प्यारी तोरी, अरुण अधर-छवि न्यारी

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pyārī torī, aruṇa adhara-chhavi nyārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1प्यारी तोरी, अरुण अधर-छवि न्यारी

2विकसित जनु बंधूक कुसुम वर, अधर ओष्ठ-लेखा री।

3प्रकट साथ मुख शशि संध्या सम, शैशव यौवन प्यारी।

4उदित मुखेंदु अधर-पियूष-भू, बिंब बिंब अनुहारी।

5ह्लादिन्यादि-शक्ति -गणना-मिस, अधर सुरेख सँवारी।

6हम “कृपालु” उपमान बिंबफल, राधा अधर विचारी॥

हिन्दी भावार्थ

हे किशोरी जी! तुम्हारे लाल अधरों को शोभा अत्यन्त ही निराली है, मानो बंधूक का पुष्प खिला है। तुम्हारे अधरों की लालिमा उस बिम्बफल के समान है, जो अमृत को भूमि में उत्पन्न हुआ हो एवं मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमा के हल्के प्रकाश में उस बिम्बफल का प्रतिबिम्ब पड़ रहा हो अथवा अधरों को लालिमा शिशु एवं यौवन अवस्था की उस संध्या के समान है जिस समय मुख रूपी पूर्ण चन्द्र भी खिला हो। अधरों की लालिमा में जो रेखाएँ हैं वे ही मानो ह्रादिनी आदि प्रधान शक्तियाँ हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम बिम्बफल के समान राधाजी के अधरों को न कह कर राधाजी के अधर के समान कुँदरू का फल कहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 451