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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 21

धरो मन, भानुलली को ध्यान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dharo mana, bhānulalī ko dhyāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धरो मन, भानुलली को ध्यान।

2जाको ध्यान धरत निशिवासर, सुंदर श्याम सुजान।

3कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका, तापर लर मुक्तान।

4चूनरि जरिन किनार गौर तनु, नीलांबर परिधान।

5श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी, लजवति भौंह कमान।

6नासा भल मुक्ताहल सोहति, मन मोहति मुसकान।

7पग पायल गति अति अभिरामिनि, लखि मराल सकुचान।

8पाय “कृपालु” सरस अस स्वामिनि, चरन न कस लपटान॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू निरंतर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर। जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट एवं मनोहर चंद्रिका तथा उसके ऊपर भी मोतियों की लड़ शोभा दे रही है। जिनकी जरी-किनारे की चुनरी तथा नीले रंग का वस्त्र है और जो स्वयं गौर वर्ण की हैं। जिनके कान में झुमके झूल रहे हैं तथा अत्यन्त ही सुन्दर रीति से वेणी गुथी हुई है। एवं जिनकी भौंहें धनुष को लज्जित कर रही हैं। जिनकी नासिका में सुन्दर मुक्ताहल शोभित हो रहा है एवं जो मुस्कराती हुई हठात् मन को मोहित कर लेती हैं। जिनके पैरों में पायल हैं तथा जिनको चाल हंसों को भी लज्जित करने वाली अत्यन्त मतवाली है।'कृपालु' कहते हैं कि ऐसी परम मधुर स्वामिनी को पाकर भी, अरे मन! तू उनके चरणों में सदा के लिए क्यों नहीं लिपट गया??

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 450-451