# धरो मन, भानुलली को ध्यान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0463-M10-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 216–217

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धरो मन, भानुलली को ध्यान।  
<a id="line-2"></a>जाको ध्यान धरत निशिवासर, सुंदर श्याम सुजान।  
<a id="line-3"></a>कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका, तापर लर मुक्तान।  
<a id="line-4"></a>चूनरि जरिन किनार गौर तनु, नीलांबर परिधान।  
<a id="line-5"></a>श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी, लजवति भौंह कमान।  
<a id="line-6"></a>नासा भल मुक्ताहल सोहति, मन मोहति मुसकान।  
<a id="line-7"></a>पग पायल गति अति अभिरामिनि, लखि मराल सकुचान।  
<a id="line-8"></a>पाय “कृपालु” सरस अस स्वामिनि, चरन न कस लपटान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू निरंतर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर। जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट एवं मनोहर चंद्रिका तथा उसके ऊपर भी मोतियों की लड़ शोभा दे रही है। जिनकी जरी-किनारे की चुनरी तथा नीले रंग का वस्त्र है और जो स्वयं गौर वर्ण की हैं। जिनके कान में झुमके झूल रहे हैं तथा अत्यन्त ही सुन्दर रीति से वेणी गुथी हुई है। एवं जिनकी भौंहें धनुष को लज्जित कर रही हैं। जिनकी नासिका में सुन्दर मुक्ताहल शोभित हो रहा है एवं जो मुस्कराती हुई हठात् मन को मोहित कर लेती हैं। जिनके पैरों में पायल हैं तथा जिनको चाल हंसों को भी लज्जित करने वाली अत्यन्त मतवाली है।'कृपालु' कहते हैं कि ऐसी परम मधुर स्वामिनी को पाकर भी, अरे मन! तू उनके चरणों में सदा के लिए क्यों नहीं लिपट गया??

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 450-451

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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