श्रीराधा-माधुरी · पद 20
धरु भानु नंदिनिहिं ध्यान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dharu bhānunandinihiṁ dhyāna re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धरु भानु नंदिनिहिं ध्यान रे।
2सुवरन वरन गौर तनु दमकनि, दुति दामिनि उनमान रे।
3मणिनजटित सिर कनक-मुकुट लखि, अगणित चंद्र लजान रे।
4मधुर नैन की मधुर विलोकनि, मधुर मधुर मुसकान रे।
5गोल कपोल नाक नथ बेसर, करनफूल दोउ कान रे।
6गर दुलरी तिलरी, उर कंचुकि, नीलांबर लहरान रे।
7कटि किंकिनि, पग पायल भल छवि, बिछुवनि कौन बखान रे।
8रूप “कृपालु” अनूपम कछु कछु, जानत श्याम सुजान रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! श्री वृषभानुनन्दिनी राधिका का ध्यान कर। जिनकी सुवर्ण के समान गौर रंग के शरीर की चमक बिजली की चमक के समान है। सिर पर सुवर्ण के मुकुट में जड़ी हुई मणियाँ अगणित चन्द्रमा को लजा रही हैं। किशोरी जी के सुन्दर नेत्र तथा विलक्षण कटाक्ष एवं मुस्कान मधुरता से भी अधिक मधुर हैं, जिनके गोल कपोल हैं। नासिका में नथ एवं बेसर पहने हुए हैं। दोनों कानों में कर्णफूल धारण किये हुए हैं। गले में दुलरी तिलरी आदि पहने हुए हैं। वक्षस्थल पर सुन्दर कंचुकी है। नीलाम्बर की फहरान अत्यन्त ही सुन्दर है। कमर में किंकिणी एवं पैर में पायल की शोभा निराली है। पैर की अँगुलियों में निछुओं की छवि तो अवर्णनीय है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनका रूप सर्वथा अनुपमेय है, थोड़ा-थोड़ा केवल श्यामसुन्दर ही जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 449