# धरु भानु नंदिनिहिं ध्यान रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0462-M10-K020
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 20
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 216–216

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धरु भानु नंदिनिहिं ध्यान रे।  
<a id="line-2"></a>सुवरन वरन गौर तनु दमकनि, दुति दामिनि उनमान रे।  
<a id="line-3"></a>मणिनजटित सिर कनक-मुकुट लखि, अगणित चंद्र लजान रे।  
<a id="line-4"></a>मधुर नैन की मधुर विलोकनि, मधुर मधुर मुसकान रे।  
<a id="line-5"></a>गोल कपोल नाक नथ बेसर, करनफूल दोउ कान रे।  
<a id="line-6"></a>गर दुलरी तिलरी, उर कंचुकि, नीलांबर लहरान रे।  
<a id="line-7"></a>कटि किंकिनि, पग पायल भल छवि, बिछुवनि कौन बखान रे।  
<a id="line-8"></a>रूप “कृपालु” अनूपम कछु कछु, जानत श्याम सुजान रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! श्री वृषभानुनन्दिनी राधिका का ध्यान कर। जिनकी सुवर्ण के समान गौर रंग के शरीर की चमक बिजली की चमक के समान है। सिर पर सुवर्ण के मुकुट में जड़ी हुई मणियाँ अगणित चन्द्रमा को लजा रही हैं। किशोरी जी के सुन्दर नेत्र तथा विलक्षण कटाक्ष एवं मुस्कान मधुरता से भी अधिक मधुर हैं, जिनके गोल कपोल हैं। नासिका में नथ एवं बेसर पहने हुए हैं। दोनों कानों में कर्णफूल धारण किये हुए हैं। गले में दुलरी तिलरी आदि पहने हुए हैं। वक्षस्थल पर सुन्दर कंचुकी है। नीलाम्बर की फहरान अत्यन्त ही सुन्दर है। कमर में किंकिणी एवं पैर में पायल की शोभा निराली है। पैर की अँगुलियों में निछुओं की छवि तो अवर्णनीय है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनका रूप सर्वथा अनुपमेय है, थोड़ा-थोड़ा केवल श्यामसुन्दर ही जानते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 449

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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